क्या मिलता आतंकवाद से??

आज फिर मेरे कुछ भाई वीरगति को प्राप्त हुए।

आज फिर मेरी मातृभूमि का सीना लाल हुआ।

उजड़ा है चमन जो कल तक था स्वर्ग समान।

ना जाने कब थकेगा तू, ऐ बेईमान!

सहमा – सा मेरा मन कर रहा है एक सवाल!

छीन कर शांति, क्यों है ये बवाल?

इतने हमलों के बाद में क्या लगा तुम्हारे हाथ है?

क्यों निर्दोषों को मारना तुम्हारे लिए जिहाद है?

मत भूलो मरना तुम्हें भी एक दिन है,

उस ऊपरवाले को क्या मुंह दिखाओगे?

ट्रेनों में, भीड़ – भाड़ में bomb blasts,

How long is this going to last?

कभी संसद, कभी पूजा – स्थल,

संसाधन कभी चल, कभी अचल।

गुरदासपुर

पठानकोट

पांपोर

कोकराझाड़

उरी

बारामूला

नागरोटा

सुंजुवान

सुकमा

पुलवामा

दांतिवाड़ा

और अब फिर हंदवारा ।

ख़ून खौल उठता है ये सुन के, देख के, सोच के!

फिर भी हम हिंसा की पहल नहीं करते।

क्योंकि हम शांतिप्रिय हैं, ऐसा नहीं कि तुमसे डरते।

ये गलतफहमी ना तुम पालना।

ना हल्के में लेना, ना यूहीं टालना।

‘अमन का पैग़ाम’ हमारी कमज़ोरी नहीं,

शान्ति बनाए रखना हमारी मज़बूरी नहीं,

ये बहादुरों का गहना है, भीरुओं के बस की बात नहीं।

ज़रा सोचो, ये सब करके तुम्हें क्या मिला?

ना जाने कब थमेगा ये सिलसिला?

ऐ मूर्खों! जागो और होश संभालो,

और ज़रा सर्जिकल स्ट्राइक को याद करो।

‘ईंट का जवाब पत्थर से देना’ हमें बखूबी आता है।

पर ‘क्षमा वीरस्य भूषणम’ हमें ये सिखाया जाता है।

इसलिए ‘अरे आतंकवाद – जनक ‘

ज़रा पुनर्विचार कर।

नीति – अनीति, सही – गलत का फ़र्क समझ,

हमारी नहीं अपनी सुरक्षा हेतु,

वरना हम भी काल हैं, राहू – केतू।

हमें फूलों के गुलदस्ते से स्वागत करना भी आता है,

और उन्हीं फूलों का हार तुम्हारी तस्वीर पर टंगाना भी आता है।

इसलिए ‘अरे आतंकवाद – जनक ‘

ज़रा पुनर्विचार कर।

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